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बचपन का खेल

  जब हम १७ /१८ साल के थे उस समय ना मोबाईल था ना टीवी हमको सेक्स के बारे मैं तो कुछ पता ही नही था । मेरी उमर २५ साल है। मैं गुजरात का रहने वाला हूँ। मैंने यहाँ अन्तर्वासना पर बहुत सी सच्ची-झूठी कहानियाँ पढ़ी हैं पर मुझे बहुत मजा आया और उन्हें पढ़ने के बाद मैंने बहुत बार मुठ मारी है। मैं आपको अपनी कई साल पहले की एक जन्नत के सफर की कहानी सुना रहा हूँ। मुझे सेक्स के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी मगर मेरी एक बहन थी वो मुझसे उमर में ६ साल बड़ी थी। हम लोग अक्सर टीवी देखते वक़्त अपनी पसंद का चैनल देखने के लिए झगड़ते थे। तब वो रिमोट को अपने पास जबरदस्ती छुपा देती थी। वो रिमोट को अपने बूब्स के ऊपर दबा के रख लेती थी और मुझे चिढाती थी। तब मैं गुस्से में रिमोट लेने के लिए जाता तो वो रिमोट लेने के लिए बढ़े मेरे हाथों को अपने हाथों से बूब्स को दबवाती थी और फ़िर धीरे धीरे मुझे अपने साथ बिस्तर पर ले जाकर मुझे लिटा देती थी। वो धीरे धीरे मेरा हाथ अपने कुरते के अन्दर ले जाकर अपने बूब्स दबवाती थी। इस तरह अक्सर हमारे बीच में होता रहता था। जैसे जैसे वक़्त बीतने लगा, ऐसा होने पर मुझे कुछ कुछ होने लगता था और धी

मालिक और नौकरानी

  मैं अभी २८ की हूँ। मेरे पति का स्वर्गवास हुए १ साल हो गया था। वो एक दुर्घटना में चल बसे थे। मैं एम ए पास हूँ। एक प्राईवेट स्कूल में टीचर थी लेकिन वेतन बहुत ही कम था। उन्हीं दिनो मेरे एक सहयोगी ने बताया कि सेठ विनय के यहाँ एक घर की देखभाल के लिये एक महिला की जरूरत है। मैं उनसे जा कर मिल लूं, वो अच्छी तनख्वाह देंगे। बस उन्हें यह मत बताना कि ज्यादा पढ़ी लिखी हो। मैं सेठ विनय के यहां ७.३० बजे ही पहुंच गई। वो उस समय घर पर ही थे। मैंने घंटी बजाई तो उन्होने मुझे अन्दर बुला लिया। मैंने उन्हें बताया कि उनके यहाँ नौकरी के लिए आई हूं। उन्होने मुझे मुझे गौर से देखा और कुछ प्रश्न पूछे … फिर बोले,”कितना वेतन लोगी?” “जी … जहां मैं काम करती थी वहां मुझे २५०० रुपये मिलते थे !” “अभी ३००० दूंगा … फिर काम देख कर बढ़ा दूंगा … तुम्हें खाना और रहना फ़्री है … जाओ पीछे सर्वेन्ट क्वार्टर है।” उन्होने चाबी देते हुए कहा “सफ़ाई कर लेना … आज से ही काम पर आ जाओ !” मेरी तो जैसे किस्मत ही जाग गई। किराये के मकान का खर्चा बच गया और खाना मुफ़्त ! फिर ३००० रुपये तनख्वाह। मैं तुरन्त चाबी ले कर पीछे गई, ताला खोला तो शान

बचपन की कहानी विनोद कुमार की जुबानी

दोस्तो आज मेरी उमर ४२ साल है जब में १८ साल का हुआ था। तब की एक काल्पनिक कहानी आप दोस्तो को सुनाने जा रहा हूं। तब मेरी एक सगी बुआ की लड़की शबाना उस समय १९ साल की थी। वह दिखने में बाहों त अच्छी थी उसके बूब्स बडे़ थे। जब ओ हिलते तो मुझे अकड़न सी होती थी।अक्सर मुझे अपने घर ले जाया करती थी। मेरे घरवाले सब इसलिए अनुमति दे देते थे क्योंकि उसके कोई भाई नहीं था। मैं उसे बहन की तरह ही प्यार करता था। लेकिन उसके दिल में कुछ छिपा था। एक दिन मैं साइकिल चला रहा था कि अचानक मेरे आँड दब गये। मुझे बहुत दर्द हो रहा था। बुआजी और २ बहनें एक शादी में गई थीं। जब मुझसे नहीं रहा गया तो मैंने शबाना दीदी को बताया। दीदी ने मेरी पैन्ट व अन्डरवीयर खोलने को कहा। पहले तो मैं शरमाया परन्तु फिर मैंने खोल दिया। दीदी ने आयोडेक्स मेरी गोलियों पर लगाना शुरू किया और कभी कभी मेरे लन्ड को भी छू देती थी मुझे चिढ़ाने के लिए। दीदी का हाथ लगते ही वह अपने पूरे आकार में आ गया आखिर दीदी ने बोल ही दिया- बाप रे ! कितना बड़ा है। उसके तीन दिन बाद एक दिन मैंने दीदी को झाँट साफ करते देख लिया। वे रेजर से साफ कर रहीं थी। मैं श

कच्चा केला

 यह बात तब की है जब मैं अपनी शादी के करीब छः महीने बाद अपनी छोटी मौसी के घर कुछ दिन रहने के लिए गई थी। मेरे पति को किसी ज़रूरी बिज़नस के सिलसिले में गोआ जाना पड़ गया था और वो करीब एक-डेढ़ महीने बाद आने वाले थे। पीछे से मैं कुछ दिनों के लिए अपने मायके चली गई और वहां से एक हफ्ते बाद ही मेरी छोटी मौसी मुझे लेने आ गई कि चल संजू कुछ दिन हमारे साथ भी रह जा ! मैं भी फ्री थी सोचा चलो मौसी के घर ही चलते हैं। जब हम मौसी के घर पहुंचे तो मेरा स्वागत मौसी के बेटे 18 वर्षीय मयंक और उसकी छोटी बहन १५ साल की सुंदर सी अंकिता ने किया। मैं भी सबको बड़ी गर्मजोशी से मिली, शाम को मौसा जी आये उन्होंने भी बड़ा प्यार दिया। 3 दिन बाद मौसी कपड़े धो रही थी तो उन्होंने कहा- अरे संजू ज़रा यह कपड़े छत पर सुखा आ ! मैं भी खाली बैठी थी, सोचा कि चलो थोड़ा काम ही कर लूं ! मैंने कपड़ों वाली बाल्टी उठाई और सुखाने के लिये छत पर चली गई। छत पर मयंक बैठा पढ़ रहा था। मैं बाल्टी से कपड़े निकाल निकाल कर लोहे की तार पर डाल रही थी। अचानक मुझे अहसास हुआ कि जैसे कोई मुझे बहुत घूर घूर के देख रहा हो। मैंने देखा तो ये मयंक ही था। जब भी मैं क

पिताजी फोज में मां अकेली

  दोस्तो में विनोद कुमार। आपके लिए एक नई झक्कास कहानी लेकर आया हु।मेरा तबादला नागपुर हो गया। में नया नया वहा रहने के लिए चला गया । वहा गलि में रोज एक कामवाली स्वीटी नाम था उसका।उसकी आयु रही होगी करीब २५ साल। वो रोज़ मेरी गली से जाया करती थी. वह दूसरे घरों में झाड़ू पोछे का काम करती थी. वह दिखने में सुंदर, छरहरी काया की स्वामिनी और पक्के से रंग की थी.उसके बूब्स काफ़ी बड़े थे। मैं कई बार उससे बात करने की कोशिश करता था मगर अपने संकोची स्वभाव के कारण बात नहीं कर पाया था. मगर एक दिन हिम्मत करके मैंने उसे गली से जाते हुए टोक दिया. उसने बड़े प्यार से मुझसे पूछा- बताइये क्या काम है आपको? तो मैंने कहा- मुझे अपने आफिस में झाड़ू पोछे का काम करने के लिए किसी की आवश्यकता है. क्या आप काम कर सकती हैं? उसने तुरंत उत्तर दिया कि काम तो वो कर देगी मगर सबसे आख़िर में घर जाते हुए ही काम करने का समय रखना पड़ेगा. उसके घर जाने का उसका समय करीब 11 बजे दिन का रहता था तो मैंने उसको तुरंत हां कर दी और अगले दिन से वो काम पर आने लगी. शुरू-शुरू में एक दो दिन मैंने उसे काम करते देखा तो मैंने उसके स्तनों की तरफ ध्यान दि

मेरी कामवाली

 दोस्तो में विनोद कुमार। आपके लिए एक नई झक्कास कहानी लेकर आया हु।मेरा तबादला नागपुर हो गया। में नया नया वहा रहने के लिए चला गया । वहा गलि में रोज एक कामवाली स्वीटी नाम था उसका।उसकी आयु रही होगी करीब २५ साल। वो रोज़ मेरी गली से जाया करती थी. वह दूसरे घरों में झाड़ू पोछे का काम करती थी. वह दिखने में सुंदर, छरहरी काया की स्वामिनी और पक्के से रंग की थी.उसके बूब्स काफ़ी बड़े थे। मैं कई बार उससे बात करने की कोशिश करता था मगर अपने संकोची स्वभाव के कारण बात नहीं कर पाया था. मगर एक दिन हिम्मत करके मैंने उसे गली से जाते हुए टोक दिया. उसने बड़े प्यार से मुझसे पूछा- बताइये क्या काम है आपको? तो मैंने कहा- मुझे अपने आफिस में झाड़ू पोछे का काम करने के लिए किसी की आवश्यकता है. क्या आप काम कर सकती हैं? उसने तुरंत उत्तर दिया कि काम तो वो कर देगी मगर सबसे आख़िर में घर जाते हुए ही काम करने का समय रखना पड़ेगा. उसके घर जाने का उसका समय करीब 11 बजे दिन का रहता था तो मैंने उसको तुरंत हां कर दी और अगले दिन से वो काम पर आने लगी. शुरू-शुरू में एक दो दिन मैंने उसे काम करते देखा तो मैंने उसके स्तनों की तरफ ध्यान दिय

मकान मालिक की पत्नी रज्जो

मुझे बड़ी उमर की औरतें बहुत पसंद हैं। अक्सर ऐसी औरतें आसानी से नही मिलती।मैं नागपुर गया तो एक बंगले में पेईंग गेस्ट बनकर रहता था। घर के मालिक काफ़ी अच्छे थे और उनकी पत्नी हमेशा अकेली और मायूस रहती थी। उसका नाम रंजना था। जैसा नाम वैसे ही रूप।उपर वाले ने फ़ुर्सत में उसको बनाया था। बला की ख़ूबसूरती थी उसमें। उमर कोई 35/40 होगी। फ़िर भी चेहरे से मदमस्त मदमाती नशीली लगती थी जो कि रस से भरी हुई हो और उनके अंग-अंग से रस छलकता था।उसके बूब्स मानो ब्लाउज मेसे बाहर आने को किया करते थे।उसके पति को उनमें कोई रूचि नहीं थी, ऐसा मुझे अक्सर लगता था। एक दिन रज्जो ने मुझे रात के खाने के लिए आमंत्रित किया। मैंने अपने बिज़ी होने का नाटक किया फिर भी आग्रह करने पर मैं मान गया। दूसरे दिन शाम को मैं जल्दी ही ऑफिस से आ गया और मौक़े का इंतज़ार करने लगा। रात के करीब साढ़े दस बजे रज्जो ने मुझे खाने के लिए आवाज़ दी। मैंने कहा कि १घंटे में आता हूँ।मैंने रज्जो के लिए एक विस्की का बंफर लेकर उसके पास गया। वहाँ पहुँचते ही मैंने पूछा कि अंकल किधर हैं। इस बात पर उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। मैं समझ गया कि अब सबकुछ मुझ पर